बुधवार, 13 जनवरी 2016

प्रदूषण से दिल्ली की जनता बेहाल-लाल बिहारी लाल लाल

प्रदूषण से दिल्ली की जनता बेहाल-लाल बिहारी लाल
लाल बिहारी गुप्ता लाल 



दिल्ली। आज दिल्ली विश्व में टोकियो के बाद सर्वाधिक प्रदूषित शहर है।सन 2014 में टोकियो की आबादी 3.80 करोड़ थी जबकि दिल्ली की 2.5 करोड़ आबादी  थी । बढ़ती हुई आबादी के दर को देख के कहा जा सकता है कि सन 2030 तक दिल्ली दूसरे नंबर पर ही प्रदूशित शहरों की श्रेणी में रहेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) एंव यूरोपियन यूनियन ने पी.एम. 2.5 प्रदूषण का स्तर प्रतिघन मीटर 25 माइक्रोग्राम निर्धारित किया है जबकि अमेरिका इससे भी कड़ा यह स्तर 12 माइक्रोग्राम निर्धारित किया है । दिल्ली में यह स्तर सामान्यतः 317 है कभी कभार इससे ज्यादा भी हो जाता है। यह स्तर अमेरिका से लगभग 30 गुना औऱ विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानको से 15 गुना ज्यादा है। इससे कैंसर,दिल की बिमारियाँ,स्थमा एवं अन्य घातक बिमारियां होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भारी यातायात,स्थानीय उद्योग,थर्मल पावर प्लांट एवं झूग्गियों में कोयले पर खाना बनाना दिल्ली में वायू प्रदूषण के स्तर को बढ़ाने में काफी योगदान करते है।
              दिल्ली में नीजि एवं कर्मशियल पंजीकृत गाड़ियों की संख्या 88 लाख है । जिसमें 29-30 लाख कारे तथा 55-56 लाख दुपहिया वाहन हैं। प्रदूषण फैलाने में सड़को एवं ट्रको के बाद दुपहिया वाहनों का 18-19 प्रतिशत तथा कारो का14-15 प्रतिशत दिल्ली की हवा खराब करने में योगदान है।दिल्ली में सन 2011 में दि.प. नि. के पास 6,000 से अधिक बसे थी सन 22012-13 तक यह घटकर 4,500 रह गई। आज इसमें भी 500-600 वसे प्रतिदिन रोड पर ब्रेक डाउन रहती है जिससें दिल्ली की जनता काफी परेशान है।सरकार पिछले 3-4 साल में कोई खास पहल नहीं किया जिससें दूपहिया एवं नीजि वाहनों पर आत्मनिर्भरता बढ़ी है। अतः दिल्ली की जनता प्रदूषण से काफी बेहाल है। आज जरुरत है कि इससे निजात के लिए कुछ स्थायी समाधान किया जाये। 
    भारत की भूमी दुनिया की भूमि के 2.4 प्रतिशत जबकि आबादी लगभग 18 प्रतिशत है । इस तरह प्रति ब्यक्ति संसाधनों पर अन्य देशों की वनिस्पत भारत में काफी दबाव है जिससे तेजी से शहरीकरण एवं औद्योदिकरण हो रहा है। सन 1947 में वर्ष 2002 तक पानी की उपलब्धता 70 प्रतिशत घटकर 1822 घनमीटर प्रति ब्यक्ति रह गया है। अगर इसी तरह संसाधनों का दोहन तेजी से होता रहा तो मावव जल के बिना मच्छली की तरह तड़प-तड़प कर एख दिन जान दे देगा। भारत में वनों का औसत भोगोलिक क्षेत्रफल 18.34 प्रतिशत है जो की समान्य 33 प्रतिशत के मनदंड से काफी कम है। इसमें भी 50 प्रतिशत म.प्र.(20.7) और पूर्वोतर के राज्यो में (25.7) प्रतिशत है वाकी के राज्य  वन के मामलें में काफी निर्धन है। वन की कमी से जलवायु परिवर्तन हो रहा  है। तभी कुछ दिन पहले तामिलनाड्ड़ू जल तांडव से ग्रस्त था।
   प्रदूषण के मामलें में केन्द्र एवं राज्य सरकारें नियम तो बना रखा है पर इस पर सख्ती से अमल नहीं हो पाता है यही कारण है की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का ग्राफ काफी तेजी से बढ़ा है। यहा पर सार्वजनिक परिवहन ब्यवस्था काफी लचर है।आम आदमी की नई सरकार बनी
थी तो लोगो ने सोचा की काफी सुधार होगा पर यह सरकार पिछली सरकार से भी फिसड्डी साबित हुई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टीश टी.एस. ठाकुर के फटकार पर दिल्ली सरकार ने फौरी तौर पर 1 जनवरी 2016 से 15 दिनों के लिए गाड़ियो के ओड एंव इभेन नंबर एक-एक दिन चलाने के सुझाव पर पूरी दिल्ली चली पर इ दिनों सरकारीएवं नीजि स्कूलों को बंद रखा गया तथा हजारों नीजि वसे भी चलायी गई पर नतीजा कुछ खास नहीं निकला। क्योंकि यह स्थायी समाधान नही हो सकता है। इसलिए जरुरी है कि दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन ब्यवस्था को दुरुस्त किया जाये ताकि लोगो को नीजि गाड़ियों से आत्मनिर्भरता कम हो सके  और नियमों पर सख्ती से अमल हो और लोगो को पर्यावरण के प्रति जागरुक भी किया जाये। राजनीतिज्ञों को वोट की राजनीति से बाहर आकर देशहित एवं समाजहित में कुछ करने का साहस दिखाना ही  होगा तभी देशवासियो एवं दिल्ली वासियों का भला हो सकता है।
     सुप्रीम कोर्ट के रवैये से शायद  केन्द्र एवं राज्य सरकार  जनता के हितो की रक्षा के लिए कुछ ठोस कदम उठाये। इसकी संभावना प्रबल है पर अभी भी सरकारी रवैया एवं जनता के रुख को देखकर दिल्ली से प्रदूषण के दानव को भगाना इतना आसान नहीं हैं।

लेखक- लाल कला मंच के सचिव एवं पर्यावरणप्रेमी हैं।
फोन-09868163073/07042663073