शुक्रवार, 8 मई 2015

माँ जीवन की सार है माँ है तो संसार। माँ बिना ‘लाल’जीवन समझों हैं बेकार।।-लाल बिहारी लाल

अन्तर्राष्ट्रीय माँ दिवस पर बिशोष
हिंदी फिल्मों में माँ पर कुछ यादगार  गीतों के बोल.......
लाल बिहारी लाल
माँ जीवन का सार है माँ है तो संसार।
माँ बिना लालजीवन समझों हैं बेकार।।
                (लाल बिहारी लाल)


हिंदी फिल्मों में मां की थीम पर फिल्माए गए सभी गीत फिल्म में माँ का एक दमदार किरदार के आसपास रहे हैं।  माँ एक शब्द है जिसमें श्रृष्टि के समस्त जीवो की उत्पति होती है .इसलिए माँ की महिमा अद्वितीय है।   अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो शुरू से ही कई सामाजिक हिंदी फिल्मों में मां की एक संस्कारी, पारंपरिक, और: मातृत्व की शक्ति और विश्वास से मजबूत छवि देखने को मिलती है।

   हिंदी फिल्मी गीत में माँ की छवि की शुरुआत चौथे दशक की है- हिंदी फिल्मों में मां की पहली स्पष्ट छवि उभरती है। यह छवि पारंपरिक है। जन्म देने वाली मां की छवि, जिसके प्रति गीतों में एक कृतज्ञता का भाव है। इस दौर की वे फिल्में , जिनमें मां को ध्यान में रखकर गीत-संगीत संजोया गया है, इस तरह हैं : 'प्रेम सागर' (1939) 'मां ने हमको जन्म दिया,'मेरा हक' (1939) 'मां की ममता मां की ममता, ना जगत में दूजी समता...''दीपक' (1940) 'माता की है यह अभिलाषा, मुन्ना बोले माता-माता...','प्यार' (1940) 'मां लाल-लाल पुकारे, खाली झूलना कैसे झुलाऊं' इन गीतों में मां का ममतामयी रूप सामने आता है। जाहिर है, एक चरित्र के रूप में मां को फिल्मों में अहमियत मिलने लगी थी और ये गीत उस अहमियत की ही गवाही हैं। इस तरह शुरू हुई गीतों की लयकारी में मां की यह आरंभिक छवि आगे के दशकों में दूर तक जाती है। कहीं-कहीं तो मां की भूमिका जिंदगी का ही पर्याय बन जाती है। मिसाल के तौर पर बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले बनी फिल्म 'जन्मभूमि' (1936) में सरस्वती देवी द्वारा नर्सरी राइम शैली में गाया गया गीत 'माता ने है जन्म दिया जीने के लिए, नहीं रो-रो कर मरने के लिए'

       पांचवें और छठे दशक के फिल्मी गीत में मां को प्रतीकात्मक ढंग से ईश्वर के रूप में पेश करते हैं। मां की मूरत और मातृपूजा कई तरह से मुमकिन हुई है। 'घर की नुमाइश' (1949) 'माता के प्यार में बसी है प्यार की दुनिया','धूमधाम' (1949) 'मां अब कौन सुने, कौन सुने गम की कहानी','दौपदी' (1944) 'मां किसने दिया बुझाया''अंधों का सहारा' (1948) 'मां तू ही मेरा सहारा, कैसे मिले किनारा','छमिया' (1945) 'मां-मां तुम बिन कौन सहाई','अब दिल्ली दूर नहीं (1957) 'माता ओ माता, जो तू आंख होती, मुझे यूं बिलखता अगर देखती' ये तमाम गीत कभी सीधे-सीधे, तो कभी प्रतीकों में मां की छवि को ईश्वरीय बनाने के साथ-साथ पहले से चली आ रही मां की 'जननी' वाली छवि को ही आगे ले जाते हैं।यह कहना गलत न होगा कि जिस तरह कई दशक तक हिंदी फिल्में बेहद भावुक रहीं, उनके गाने, और खासतौर से मां से संबंधित गाने, भी कुछ उसी ढर्रे पर रहे। चित्रगुप्त के संगीत में, 'खुश रहे तेरी नगरी बेटा, मां ये दुआ कर चली' ('घर बसाकर देखो'- 1962) और मदन मोहन के संगीत से सजा और मोहम्मद रफी का गाया गीत, 'मां है मुहब्बत का नाम' ('मां का आंचल'- 1970) सरीखे कई उदाहरण आगे के बरसों से भी दिए जा सकते हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीतबद्ध 'राजा और रंक' (1968) का निरूपा राय और महेश कोठारे पर फिल्माया 'तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी-प्यारी है, ओ मां' और 'छोटा भाई' (1966) फिल्म में नूतन और महेश कोठारे पर फिल्माया गया गीत 'मां मुझे अपने आंचल में छुपा ले, गले से लगा ले' जैसे लता मंगेशकर के गाए गीत बहुत खूबसूरत हैं, लेकिन अंतत: ये भी भावुकता या मातृपूजा से ऊपर नहीं उठ सके हैं।

           इसके उलट कहीं अधिक प्रभावी और यथार्थपरक है साहिर लुधयानवी का लिखा और जयदेव के संगीत से सजा फिल्म 'मुझे जीने दो' (1963) का गीत 'तेरे बचपन को जवानी की दुआं देती हूं, और दुआं दे के परेशान सी हो जाती हूँ'। इस कड़ी में मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और रोशन के संगीत से सजा फिल्म 'दादी मां' (1966) में राग यमन कल्याण आधारित गीत 'उसको नहीं देखा हमने कभी, पर इसकी जरूरत क्या होगी, ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी' (मन्ना डे, महेन्द्र कपूर) और बंगाल की जात्रा लोक शैली पर आधारित फिल्म 'मंझली दीदी' (1967) का हेमंत कुमार द्वारा संगीतबद्ध 'मां ही गंगा, मां ही जमुना, मां ही तीरथधाम' (लता मंगेशकर) को भी शामिल किया जाना चाहिए।
    आठवें दशक और इसके बाद की फिल्मों में भी मां पर आधारित कई गीत आते रहे हैं। मिसाल के लिए वसंत देसाई द्वारा संगीतबद्ध 'रानी और लालपरी' (1975) का गीत 'मां के आंसू, मां की ममता, मां जाने रे' (आशा भांसले की आवाज), कनु राय द्वारा 'आविष्कार' (1973) के लिए रचित 'मेरे लाल तुम तो हमेशा थे मेरे मन की अभिलाषा में' (मन्ना डे की आवाज), लक्ष्मी प्यारे के संगीत में फिल्म 'मां' (1978) का 'मां तुझे ढूंढूं कहां (रफी की आवाज) सरीखे गीत बड़े गायकों द्वारा गाने के बावजूद लोकप्रिय नहीं हो सके। नब्बे के दशक की फिल्मों में 'लाडला' का गाना 'तेरी उंगली पकड़ के चला, ममता के आंचल में पला', फिल्म 'बेटा' का गाना 'आज मेरी मां ने मुझको बेटा कह के बुलाया है' और फिल्म 'वास्ता' का अजित वर्मन द्वारा भटियाली की अद्भुत प्रयोगात्मक संरचना के साथ 'मां बोलो कब तलक यूं ही जलना है' जैसे गाने भी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सके। इसकी बड़ी वजह यह रही कि इन गानों में मां की पारंपरिक छवि से अलग कुछ नया गढ़ने का जतन नहीं किया गया था।
     आज भी आदुनिकता की दौड में  माँ पर हिंदी फिल्मों में गीत लिखने का सिलसिला जारी है । 'मां' की थीम पर हिंदी फिल्म संगीत के दो सबसे खूबसूरत गीत हाल की फिल्मों के ही हैं। 'तारे जमीं पर' का शंकर महादेवन की आवाज और संगीत से सजा गीत 'मैं कभी बतलाता नहीं, पर अंधेरे से डरता हूँ मैं मां' और 'दसविदानिया' का कैलाश खेर का लिखा और उन्हीं की आवाज में गाया गया 'मां, मेरी मां, प्यारी मां, मम्मा' के न सिर्फ बोल और धुन लाजवाब हैं, बल्कि यह गीत मां को नैतिकता के संस्कारी सिंहासन से उतार कर उसे एक आम इंसान की स्वाभाविकता और आत्मीयता प्रदान करते हैं। माँ अपनी सारी कमजोरियों और अच्छाइयों के साथ आज के जीवन के संदर्भों के बीच भी चट्टान की तरह खड़ी है।
सचिव- लाल काल मंच,
बदरपुर,नई दिल्ली-44
फोन-986816073

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