गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

लाल बिहारी लाल “पर्यावरण संरक्षक” सम्मान से हुए सम्मानित

सेवा सोसायटी ने लाल बिहारी लाल पर्यावरण संरक्षक सम्मान से सम्मानित
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सोनू गुप्ता





नई दिल्ली।  राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत संस्था सरस्वती एजूकेशन वेलफेयर अवेयरनेस (सेवा) सोसायटी ने लाल कला मंच के सचिव पर्यावरण प्रेमी एवं  दिल्ली रत्न बिहारी लाल का का 44वां जन्मोत्सव मीठापुर चौक पर धूमधाम से वरिष्ट समाजसेवी लोक नाथ शुक्ला की अध्यक्षता  एवं का. जगदीश चंद्र शर्मा के आतिथ्य में मनाया। इस अवसर हमारा बुंदेलखंड से पधारे वरिष्ठ लेखक एवं कवि राधेश्याम गुप्त,सेवा सोसायटी के महासचिव धुरेनद्र राय एवं अतिथियों द्वारा लाल कला मंच के संस्थापक सचिव एवं पत्रकार लाल बिहारी लाल को पर्यावरण संरक्षक" सम्मान से सम्मानित किया गया। श्री लाल को दिल्ली के कई कवियों सहित, कई पत्रकार एवं नेता इन्हें जन्म दिन की बधाई देने पहूँचे उनमें फरीदाबाद से शिव प्रभाकर ओझा,दिवाकर मिश्रा,गिरीश मिश्रा नोयडा से वरिष्ठ पत्रकार राज कुमार अग्रवाल , संतोष तिवारी,लक्ष्मी नगर से नीरज पांडे,दिल्ली से मास्टर गिरीराज शर्मा गिरीश ने लाल बिहारी लाल के लगन के देख कर कहा- कुछ किया कर कुछ किया फार पजामा सिया कर । के,पी.,सिंह, असलम जावेद,जा.पी. गैतम,बलबीर लोधे, नेताओं में का.जगदीश चंद्र शर्मा, मलखान सैफी, राजेन्द्र कुमार, भगत सिंह आदी क्षेत्र के कई गन्यमान्य उपस्थित थे। इस अवसर पर कवियों ने अपनी-अपनी कविता लाल बिहारी लाल के उपर सुनाया उनमें आकाश पागल ,सिद्दान्त कुमार नानक चंद ।सबसे ज्यादा बाहाबही सुरेश मिश्र अपराधी की कविता पर रही-
  करे समाज सेवा नित्य पर्यावरण का रखे ख्याल।
  क्षेत्र में अजब मिशाल,युग-युग जीयो बिहारी लाल।।
   का. जगदीश चंद्र शर्मा ने कहा- कि लाल बिहारी लाल लाल कला मंच के तहत क्षेत्र के नवोदित बच्चों को रंग अबीर उत्सव के माध्यम से मंच प्रदान करते है एवं सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता के माध्यम से उनका भविष्य सवांरने में भी सहयोग करते हैं।। धुरेन्द्र राय ने कहा कि लाल कला मंच एवं लाल बिहारी लाल दोनों के कार्य़ सराहनीय है। अध्यक्षीय वक्तब्य में लोक नाथ शुक्ला ने कहा- कि सेवा सोसायटी पिछले कई सालों से साहित्य ,पर्यावरण एवं संस्कृति के क्षेत्र में बदरपुर,दिल्ली  ही  बल्कि देश में काफी जाना-पहचाना नाम  है औऱ अपने क्षेत्र में काफी काम कर रही है। लाल बिहारी लाल का नाम भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में दिल्ली एवं ए.सी.आर में अदब से लिया जाता है। श्री लाल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लाल बिहारी लाल ने
कहा कि आप लोगो का स्नेह एंव प्यार यूं ही मिलता रहा तो साहित्य ,समाज एवं पर्यावरण के क्षेत्र में  प्रयास आगे भी जारी रहेगा। अंत में लाल कला मंच की अध्यक्षा सोनू गुप्ता ने भी लाल बिहारी लाल को पुष्प गुच्छ देकर जन्मदिन की हार्दिक बधाई दी।


 

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

युवाओं का साथी हिंदी और भोजपुरी सेवी- लाल बिहारी लाल

युवाओं का साथी हिंदी और भोजपुरी सेवी- लाल बिहारी लाल
 प्रो. उमेश कुमार गुप्त
 

आदर्श भोजपुरी क्षेत्र अऊर तीन ओर गंगा, गंडक, घाघरा से घिरल सारण छपरा के धरती कई गो लाल के जन्म देले बा जेइमें भोजपुरी के महाकवि लक्ष्मी सखी, बाबू रघुवीर नरायण , महेन्द्र मिसिर समेंत कई लोग बा जे आपन लेखनी से इ देश आ समाज के खूब सेवा कईले बा। एही सारण के धरती से गांव भाथा सोनहो में स्व. सत्यनारायण साह, अऊर स्व. मंगला देवी के घरे जनम लिहले लाल बिहारी लाल कवनों परिचय के मोहताज नईखन। लाल बिहारी लाल गउवा के स्कूल में पढ़ लिख के आगे बढ़ले जे आज वाणिज्य आउर उद्योग मंत्रालय,नई दिल्ली में कार्यरत बाड़े। नोकरी के साथे-साथे समाज सेवा आऊर सृजन कार्य भी खूब करत बाड़े। आपन लेखनी स्वच्छता, पर्यावरण, जल संकट, बेटी बचाओ जईसन विषय पर खूब चलवले बाड़े जेकरा के पढ़ के समाज के लाभ होता । इनकर गीत, कविता सैकड़ों पत्र-पत्रिकवन में छपल बा और कई गो पुस्तक के संपादन भी कईले बानी इहा तक कि इनकर भोजपुरी कविता " क्रांति कविता" नालंदा ओपेन विश्वविद्यालय में एम.ए. और भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के बी.ए. के पाठ्यक्रम में शामिल बा , इ सब हमन भोजपुरिया के गौरव के बात बा अऊर त अऊर इहा के कई गो कैसेट भी निकलल बा जेकरा के लोग खूब सुन रहल बा । इहा के योगदान के देख के सैकड़ों गो पुरस्कार भी मिलल बा । बाकी एगो बात बतावतानी हम इहा के पुरस्कार के मोहताज नईखी बस समाज के ए देश के खातिर कुछ कईल चाहतानी। समाजिक उत्थान के खातिर दिल्ली में लाल कला मंच भी बनवले बानी जेकर लाल बिहारी लाल जी सचिव बानी । इ संस्था के माध्यम से सामाजिक आऊर सांस्कृतिक उत्थान के काम करतानी।साँच पूछी त दिल्ली जईसन बड़ शहर में रहिके हिंदी के सेवा कईल कवनो हेतुचुकी बात नईखे लमहर बात बा। एगो बात त हम जरूरे बताइब उ इ कि इनका लेखनी में भोजपुरिया लोगन खातिर सोलहग प्रेम लऊकेला , हर समय इहा के सहयोग करे खातिर तैयार रहिले और नयका लेखक लोग खातिर त इहा के हमेशा खड़ा रहेनी । इहा के जन्मदिन पर हम भगवान से विनती करतानी कि इहा के ऐसही लिखत रही अऊर एह देश के सेवा करत रही उमर लमहर होखे निरोग रही। जयहिंदी जय भोजपुरिया ।
- भाटपार रानी, देवरिया उ.प्र.



सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी आज भी प्रासंगिक है

भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी आज भी प्रासंगिक है

लाल बिहारी लाल


भारतीय राजनीति के पुरोधा महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर मे दीवान करम चंद गाधीं के यहां हुआ था।इनके माता का नाम पुतली बाई था। इनकी शादी अल्प अवधि यानी बाल्य काल में ही 1883 में कस्तुरबा गांधी से हुई।प्रारंभिक शिक्षा गुजरात में ही हुई परन्तु वकालत करने के लिए 1888 में लंदन गये फिर वहां से 1893 में साउथ अफ्रीका  गये। अफ्रीका में पिटरर्सवर्ग में इन्हें अश्वेत होने के कारण ट्रेन के फस्ट क्लास की बोगी से उतारकर थर्ड क्लास की बोगी में चढ़ा दिया गया। इससे दुखी होकर  1906 में ही दक्षिण अफ्रीका में पहली बार सत्याग्रह आंदोलन शुरु कर दिया औऱ अंग्रैजों को झूकने पर मजबूर कर दिया।
   भारत भी अंग्रैजो के अधीन था। उनके दमनकारी नीति और लूट खसोट से जन-जन परेशान था। सन 1857 के विद्रोह के बाद धीरे -धीरे जनमानस अग्रैजों के विरुद्ध संगठित होने लगा । प्रबुद्ध लोगों औऱ आजादी के दीवानों द्वारा सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई। प्रारंभिक 20 वर्षों में 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर  उदारवादी नेताओ का दबदबा रहा। इसके बाद धीरे धीरे चरमपंथी(गरमदल) नेताओं के हाथों में बागडोर जाने लगी।

    महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी 1915 को स्वदेश (मुम्बई)में कदम रखा तभी से हर साल 9 जनवरी को  प्रवासी दिवस मनाते आ रहे हैं। जब गांधी जी स्वदेश आये तो उन्हे गोपाल कृष्ण गोखले ने सुझाव दिया कि आप देश में जगह-जगह भ्रमण कर देश की स्थिति का अवलोकन करें। अपने राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के सुझाव पर गांधी जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से भ्रमण करते हुए बंगला के मशहुर लेखक रविनद्र नाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन पहुँचे। वही पर टैगोर ने सबसे पहले गांधी जी को महात्मा कहा था औऱ गांधी जी ने टैगोर को गुरु कहा था।  गाँधी जी हमेशा थर्ड क्लास में यात्रा करते थे ताकि देश की वास्तविक स्थिति से अवगत हो सके।
    मई 1915 में गांधी जी ने अहमदाबाद के पास कोचरब में अपना आश्रम स्थापित किया लेकिन वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण साबरमती क्षेत्र में आश्रम की स्थापना की। दिसम्बर 1915 में कांग्रेस के मुम्बई अधिवेशन में गांधी जी ने भाग लिया गांधी जी ने  यहाँ विभाजित भारत को महसूस किया देश अमीर गरीब,स्वर्ण-दलित हिन्दू- मुस्लिम, नरम-गरम विचारधारा , रुढ़िवादी आधुनिक भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थक , ब्रिटिश विरोधी जिनको इस बात का बहुत कष्ट था कि देश गुलाम है। गांधी जी किसके पक्ष में खड़े हों या सबको साथ लेकर चले।  गांधी जी उस समय के करिश्माई नेता थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सबको साथ लेकर सबके अधिकारों की लड़ाई नस्लभेदी सरकार के विरुद्ध  सत्याग्रह के माध्यम से लोहा लिया था और कामयाब भी हुए थे।
    गांधी जी ने पहली बार देश में  सन 1917 में बिहार  के चंपारन में सत्याग्रह आनंदेलन किया था । उनका आन्दोलन जन आन्दोलन होता था । चंपारण में नील किसानों के तीन कठिया विधि से मुक्ति दिलाई औऱ अंग्रैजों से अपनी बात मनवाने में कामयाब हुए। गरीबों को सुत काटने एवं उससे कपड़े बनाने की प्रेरणा दी जिससे इनके जीवन-यापन में गुणात्मक सुधार आया।
   सन 1918  में गुजरात क्षेत्र का खेडा क्षेत्र -बाढ़ एवं अकाल से पीड़ित था जैसे सरदार पटेल एंव अनेक स्वयं सेवक आगे आये उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कर राहत की माँग की । गांधी जी के सत्याग्रह के आगे अंग्रैजों को झुकना पड़ा किसानों को कर देने से मुक्ति मिली सभी कैदी मुक्त कर दिए गये गांधी जी की ख्याति देश भर में फैल गई। यही नहीं खेड़ा क्षेत्र के निवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया। वहाँ के शराबियों को शराब की लत को भी छुडवाया।

 1914 से 1918 तक  प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने रालेट एक्ट  के तहत प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया, रालेट एक्ट  के तहत बिना जाँच के किसी को भी कारागार में डाला जा सकता था । गांधी जी ने देश भर में रालेट एक्ट के विरुद्ध अभियान चलाया।पंजाब में इस एक्ट का विशेष रूप से विरोध हुआ पंजाब जाते समय में गांधी जी को कैद कर लिया गया साथ ही स्थानीय कांग्रेसियों को भी कैद कर लिया गया । 13 अप्रैल को 1919 बैसाखी के पर्व पर जिसे हिन्दू-मुस्लिम सिख सभी मनाते थे अमृतसर के  जलियांवाला बाग में लोग इकठ्ठे हुए थे। जरनल डायर ने निकलने के एकमात्र रास्ता को बंद कर निर्दोष बच्चों स्त्रियों व पुरुषों को गोलियों से भून डाला एक के ऊपर एक गिर कर लाशों के ढेर लग गये जिससे पूरा देश आहत हुआ गांधी जी ने खुल कर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया अब एक ऐसे देशव्यापी आन्दोलन की जरूरत थी जिससे ब्रिटिश सरकार की जड़े हिल जाएँ ।
   खिलाफत आंदोलन के जरीये सम्पूर्ण देश में आंदोलन को धार देने के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया औऱ सितंबर 1920 के काग्रेस अधिवेशन में खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने के लिए सभी नेताओं को मना लिया। असहयोग आंदोलन की गांधी जी ने अपना परचम अग्रैजों के विरुद्ध पूरे देश में लहरा दिया। जिस कारण 1921-22 के बीच आयात आधा  हो गया 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गया।  दिसंबर 1921 में गांधी जी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। असहयोग आंदोलन का उद्देश्य अब स्वराज्य हासिल करना हो गया। गांधी जी ने अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस को राष्ट्रीय फलक पर पहुँचाने की बात कही। इन्होंने एक अनुशासनात्मक समिति का गठन किया। और असहयोग आंदोलन को उग्र होने की संभवना से फरवरी 1922 में वापस ले लिया क्योंकि चौराचौरी सहित जगह-जगह हिंसक घटनाये होने लगी। पर इन्होंने अपनी बात को पूरजोर तरीके से रखना जारी रखा। 1925-1928 तक गांधी जी ने समाज सुधार के लिए भी काफी काम किया। 1926 में विश्वब्यापी मंदी के कारण  कृषी उत्पादों की कीमत गिरने लगी। 1928 में उन्होने बारदोली सत्याग्रह में सरदार पटेल की मदद की। 1930 में गांधी ने दांड़ी मार्च तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरु किया। कांग्रेस के अध्यक्ष नेहरु के साथ 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज्य की घोषणा की। इस आंदोलन में 1 लाख से ज्यादा लोग गिरफ्तारी देने को तैयार थे।  1930 के बाद तो भारत की अर्थब्यवस्था पूरी तरह धरासायी ही हो गई। सन 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत देशवासियों ने साइमन कमीशन वापस जाओ नारे के साथ किया। धीरे –धीरे कांग्रेस का दबदबा पूरे देश में बढ़ता गया। औऱ राष्ट्र की भावना को प्रेरित कर देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने का काम गांधी जी ने बासूबी किया। गांधी जी के बढ़ते प्रभाव के कारण देशवासी अपने आप को एक सूत्र में पिरनों लगे। इस आंदोलन को शांत करने के लिए तत्कालिन वायसराय लार्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में भारत के लिए डोमिनीयन स्टेट्स का गोलमोल सा ऐलान कर दिया।इस बारे में कोई सीमा भी तय नहीं किया गया और कहा गया कि भारत के संविधान बनाने के लिए गोलमेज सम्मेलन आयोजिक किया जायेगा।
       1930-32 लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन हुआ। गांधी जी 1931 में जेल से रिहा हुए तो गांधी-इरविन–समझौता हुआ जिससे सारे कैदियों को रिहा किया गया तथा तटीय इलाके में नमक उत्पादन की छुट दी गई। पर राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए बातचीत का आश्वासन दिया गया।  गांधी जी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में में भाग लिये पर बात कुछ खास बनी नहीं ।1935 में गर्वमेंट आँफ इंडिया एक्ट बनी फिर 2 साल बाद  सीमित मताधिकार का प्रयोग करने की अनुमति दी गई। ब्रिटेन आर्मी के एक अधिकारी विंसटन चर्चिल ने इन्हें नंगा फकीर कहा जो बाद में ब्रिटेन का प्रधानमंत्री भी बना। परमाणु बम से हमले की गांधीजी ने निंदा की,आहत भी हुए पर अपना सत्य औऱ अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या सन 1942 में गांधी जी द्वारा अग्रैजों भारत छोड़ों आंन्दोलन में करो या मरो का नारा । आजादी की लड़ाई में गांधी जी का योदगान धीरे धीरे शिखर को चुमने लगा। अंत में अग्रैज विवश हो गये औऱ  ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली के पहल पर कैबिनेट मिशन की घोषणा कर दी गई। ब्रिटीश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के पटल पर उदय हुआ। 30 जनवरी 1948 को नाथुराम गोडसे ने दिल्ली में निर्मम रुप से हत्या कर दी।तभी से हर साल 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाते है। भारतीय स्वतंत्रता में गांधी जी का योगदान अद्वितीय है।आज भी हर भारतीय के जनमानस में गांधी जी का आजादी के लिए संघर्ष की दास्तान विद्यमान है औऱ गांधी के बिना भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की कहानी मानो अधूरी है। भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी आज भी प्रासंगिक है। इनके अहिंसा के रुप को देखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने  इनके जन्म दिवस पर अहिंसा दिवस मनाने की घोषणा भी कर रखा है। भारतीय राजनीति के इस महान पुरोधा को शत-शत नमन।

वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार।
फोन-7042663973



मंगलवार, 26 सितंबर 2017

गंगा पुत्र पुस्तक के लाकार्पण के समय लाल बिहारी लाल,




कंस्टीय्यूशन कल्ब में गंगा पुत्र पुस्तक के लाकार्पण के समय दिनांक 26 /9/ 2017 के संध्या में दायें से आपका मित्र लाल बिहारी लाल,अनुराधा प्रकाशन के प्रकाशक मनमोहन शर्मा जी औऱ दिल्ली की जानी मानी लेखिका कृष्णा शर्मा जी।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी को अब जन-जन की भाषा बनानी होगी-लाल बिहारी लाल

  हिन्दी को अब जन-जन की भाषा बनानी होगी-लाल बिहारी लाल


सितंबर माह आते ही हर साल हिन्दी दिवस और पखवाड़ा मनाने की चहल पहल हर सरकारी दफ्तरों में शुरु हो जाती है औऱ हिन्दी दिवस के नाम पर करोड़ो रुपये पानी की तरह बहा दिया जाता है। चाहे वो राज्य की सरकारें हो या केन्द्र सरकार हो। हिन्दी को हमारे नेता राष्ट्रभाषा बनाने चाहते थे। गांधी जी ने सन् 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था और ये भी कहा कहा था कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषाहै जिसे जनभाषा बनाया जा सकता है। 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को भारतीय संविधान में जगह दी गई पर दक्षिण भारतीय एवं अन्य कई नेताओं के विरोध के कारण राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर सन 1953 में 14 सिंतबर से हिंदी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। परन्तु सन 1956-57 में जब आन्ध्र प्रदेश को देश का पहला भाषायी आधार पर राज्य बनाया गया तभी से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की धार कुंद पड़ गई और इतनी कुंद हुई कि आज तक इसकी धार तेज नहीं हो सकी। औऱ राष्ट्रभाषा की बात राजभाषा की ओर उन्मुख हो गई।
   आज हिन्दी हर सरकारी दफ्तरो में महज सितंबर माह की शोभा बन कर रह गई है। हिन्दी को ब्यवहार में न कोई कर्मचारी अपनाना चाहता है और नाहीं कोई अधिकारी जब तक कि उसका गला इसके प्रयोग में न फंसा हो। हिन्दी के दशा एवं दिशा देने के लिए उच्च स्तर पर कुछ प्रयास भी हुए। इसके लिए कुछ फांट भी आये और इसके दोषों को सुधारा भी गया औऱ आज सारी दुनिया में अंग्रैजी की भांति हिन्दी के भी सर्वब्यापी फांट यूनीकोड आ गया है जो हर लिहाज से काफी  सरल ,सुगम एवं प्रयोग में भी आसान है। सरकार हिंदी के उत्थान हेतु कई नियम एवं अधिनियम बना चुकी है परन्तु अंग्रैजी हटाने के लिए सबसे बड़ी बाधा राज्य
सरकारें है।क्योकिं नियम में स्पष्ट वर्णन है कि जब तक भारत के समस्त राज्य अपने अपने विधानसभाओं में एक बिल(विधेयक) इसे हटाने के लिए पारित कर केन्द्र सरकार के पास नहीं भेज देती तब तक संसद कोई भी कानून इस विषय पर नहीं बना सकती है।
    ऐसे में अगर एक भी राज्य ऐसा नहीं करती है तो कुछ भी नहीं हो सकता है। नागालैण्ड एक छोटा सा राज्य है जहां की सरकारी भाषा अंग्रेजी है। तो भला वो  क्यों चाहेगा कि उसकी सता समाप्त हो। दूसरी ओर तामिलनाडू की सरकार एंव राजनीतिज्ञ भी हिन्दी के घोर विरोधी है औऱ नहीं चाहते की उन पर हिन्दी थोपी जाये जबकि वहां की अधिकांश जनता आसानी से हिन्दी बोलती एवं समझती है।आज भारत के राजनीतिज्ञों ने हिन्दी को कुर्सी से इस तरह जोड़ दिया है कि अब इसको राष्ट्रभाषा बनाने के सपने धूमिल हो गये हैं।आज हिन्दी विश्व पटल पर तो फैली है लेकिन भारत में ही उपेक्षित है । विदेशों में बाजारीकरण के कारण काफी लोकप्रिय हो गई है।कई देशों ने इसे स्वीकार किया है। कई विदेशी कंपनिया भी आज अपने उत्पादों के विज्ञापन हिन्दी में देने लगी है। इंटरनेट की कई सोशल सर्विस देने वाली साइटें मसलन-ट्वीटर ,फेसबूक,गूगल आदि पर भी हिन्दी की उपलब्धता आसानी से देखी जा सकती है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित की गई थी। तब से लेकर अब तक देश दुनिया में 10 विश्व हिन्दी सम्मेलन इसके प्रचार-प्रसार के लिए आयोजित की जा चुकी है। हर साल 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस भी मनाते है। हिन्दी आज विश्व में लगभग 137 देशों में बोली जाती है।विश्व के प्रमूख 16 भाषाओं में 5 भारतीय भाषाएं शामिल है।
  2001 की जनगणना के अनुसार भारत में हिंदी बोलनेवाले  41.03 प्रतिशत थे। आज भारत में हिन्दी बोलने,लिखने तथा ब्यवहारिक प्रयोग करने वालों की संख्या लगभग 70 प्रतिशत है फिर भी आज दुख इस बात का है कि सरकारी दफ्तरों में और न्यायालयों में अंग्रैजी का बोलबाला है। इसलिए आज अपने ही देश में हिन्दी बे-हाल होते जा रही है। अतः आज जरुरी है कि सरकारी दफ्तरों में हिंदी का प्रयोग बढ़ाना होगा तभी यह जन-जन की भाषा बन पायेगी। यही कुछ कहना है लाल कला सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना मंच,नई दिल्ली के संस्थापक सचिव हिन्दी सेवी ,पर्यावरण प्रेमी दिल्ली रत्न लाल बिहारी लाल का।


लेखक-लाल कला मंच,नई दिल्ली के सचिव है।