सोमवार, 20 नवंबर 2017

भोजपुरी की ‘मैना’ मैनावती देवी की आवाज मौन हो गई

भोजपुरी की मैना मैनावती देवी की आवाज मौन हो गई

लाल बिहारी लाल
नई दिल्ली। भोजपुरी को पहचान दिलाने वाली, लोकगीतों से सामाजिक जीवन को मानव पटल पर उतारने वाली लोकगायिका मैनावती देवी  श्रीवास्तव का जन्म  बिहार के सिवान जिले की पचरूखी  में 1मई 1940 को हुई थी। पर  उन्होनें अपनी कर्मभूमि गोरखपुर को बनायी। उन्होनें लोकगायन की शुरूआत गोरखपुर से सन् 1974 में आकाशवाणी गोरखपुर की शुरूआत के साथ की। आकाशवाणी गोरखपुर की शुरूआत मैनावती देवी श्रीवास्तव के गीतों से ही हुई। उनके गीतों के बाद से ही भोजपुरी संस्कृति को एक अलग पहचान मिली। उन्होने लोक गीतों के संरक्षण ,संवर्धन एंव प्रचार प्रसार पर काफी काम किया।उन्होंने लोकपरंपरा के संस्कार गीतों को पिरोने का काम बा-खूबी किया। लोकपरंपरा में भारतीय सामाजिक परिवेश में रहन-सहन, जीवन-मरण से लेकर हर परिवेश को उन्होने बड़ी ही कुशलता से अपनी रचनाओं में भी उकेरा है। वह कवियत्री और लेखिका भी थी। प्रयाग संगीत समिति से संगीत प्रभाकर की डिग्री ली थी। म्यूजिक कंपोजर के रूप में आकाशवाणी में काम किया। साथ ही दूरदर्शन में भी उन्होने अपना अमूल्य योगदान दिया। इनकी गायिकी के विरासत को इनके पुत्र राकेश श्रीवास्तव भी आज देश दुनिया में बढ़ा रहे है।
     श्रीमती नैना देवी के प्रकाशित पुस्तको में 1977 में गांव के दो गीत(भोजपुरी गीत), श्री सरस्वती चालीसा, श्री चित्रगुप्त चालीसा, पपिहा सेवाती(भोजपुरी गीत), पुरखन के थाती(भोजपुरी पारंपरिक गीत), तथा  अप्रकाशित पुस्तकों में कचरस (भोजपुरी गीत), याद करे तेरी मैना(इछ  हदी गीत), चोर के दाढ़ी में तिनका (कविता)और बे घरनी घर भूत के डेरा(कहानी) जैसे अनमोल गीत समाज को दिया। सन् 1974 से लोकगायन की शुरूआत करने वाली मैनावती देवी को पहला सम्मान सन् 1981 में लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के 94वें जन्मदिवस के अवसर पर बिहार में "भोजपुरी लोक साधिका" का सम्मान मिला। उसके बाद सन् 1994 में अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद लखनऊ द्वारा "भोजपुरी शिरोमणि" का सम्मान ठुमरी गायिका गिरजा देवी के हाथों प्राप्त किया था। इसके बाद उन्हे अनेकों सम्मान प्राप्त किया उनमें भोजपुरी रत्न सम्मान, 2001 में भोजपूरी भूषण सम्मान , 2005 में नवरत्न सम्मान, 2006 में 2012 में लोकनायक भिखारी ठाकुर सम्मान, लाइफ टाइम एचिवमेन्ट अवार्ड तथा गोरखपुर गौरव जैसे सम्मान से नवाजा गया। उन्हे कोई राजकीय सम्मान नहीं मिला फिर भी भोजपुरी की सेवा में रात दिन अंतिम सांस तक  लगी रही। ऐसे महान भोजपुरी सेवी को शत शत नमन है।
*लेखक-भोजपुरी के जानेमाने गीतकार हैं।
फोन -7042663073या 9868163073



रविवार, 12 नवंबर 2017

बाल दिवस पर लाल बिहारी लाल के कुछ दोहे

बाल दिवस पर लाल बिहारी लाल के कुछ दोहे



दशरथ पिता नहीं रहे, कहां मिलेंगे राम।
रिश्ते भी अब नेट पर, ढूढ़े मिले तमाम।1

पढना लाल भूल गये, संस्कारों की बात।
कौन उन्हें समझाये,आज भला यह बात।2

बाल साहित्यकार भी,हो गये आज स्यान।
लाल भी अब ठीक-ठीक, कैसे पाये ज्ञान।3

बाल साहित्य में छुपा, दुनिया भर का ज्ञान।
ठीक-ठीक जो पढ़ लिया,उस घर का कल्याण।4

लाल-लाल अब ना रहा बन गया आज बाप।
खोद रहा खुद की कबर,देखों अपने आप।5

लाल कहां अब जा रहा, देखो आज इंसान।
आज इसे यही रोको,जन-जन दो अब ध्यान।6

सचिव –लाल कला मंच, नई दिल्ली
फोन-7042663073


बुधवार, 8 नवंबर 2017

गीत-दिल्ली की हवा खराब हुई

गीत-दिल्ली की हवा खराब हुई


गीतकार- लाल बिहारी लाल

दिल्ली की हवा खराब हुई,दिल्ली की हवा खराब
पी.एम.,सी.एम सब हांफे ,जनता का हाल खराब
दिल्ली की हवा खराब हुई,दिल्ली.....


कभी थी हरियाली फैली दिल्ली के चारो ओर
अब कंक्रीट फैल गया है संग में धुंआ औ शोर
शासन और राशन के आगे,जनता हुई बर्बाद
दिल्ली की हवा खराब हुई,दिल्ली.....

सड़को पे गाड़ी का देखों उमड़ा है खूब सैलाब
चूहा बिल्ली के खेल में देखो,नेता हुए नबाब
निश दिन आबादी यहां पर और हुई आबाद
दिल्ली की हवा खराब हुई,दिल्ली.....


कल कारखाने खुल रहें अब देखो गली-गली
इसके असर से दुखी है नानक संग राम अली
न जाने दिन कैसे कटे औऱ कैसे हो गई शाम
दिल्ली की हवा खराब हुई,दिल्ली.....


धरा बचा लो देश बचा लो औऱ बचा लो दिल्ली
पेड़ लगा लो लाल बचा लो और बचा लो लिली
नदियाँ  सारी सुख रही और सुख रहे तालाब
दिल्ली की हवा खराब हुई,दिल्ली.....

सचिव –लाल कला मंच, नई दिल्ली





 

 

मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री औऱ आयरन लेडी- इंदिरा गांधी

पुण्य तिथि पर विशेष( 31 अक्टूबर)
देश की पहली महिला प्रधानमंत्री औऱ आयरन लेडी- इंदिरा गांधी
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भारत में हरित क्रांति और गरीबी उनमुलन के प्रणेता
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लाल बिहारी लाल


आयरन लेडी इंदिरा गांधी का जन्म देश के एक आर्थिक एंव बैध्दिक रुप से सभ्रांत परिवार में पं. जवाहर लाल नेहरु के घऱ में 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद के आनंद भवन में हुआ था। इनके माता का नाम कमला नेहरु तथा दादा का नाम पं. मोती लाल नेहरु था। इनके दादा एंव पिता दोनों वकालत करते थे।बचपन में इनके माता पिता का लार-दुलार ज्यादा नहीं मिला क्योंकि पिता भारतीय राजनीति में ब्यस्त थे वही माता अस्वस्थ्य रहती थी। इन्हें दादा से ज्यादा लार-दुलार मिला क्योंकि यह घर की इकलौती संतान थी। इनके दादा इन्हें लक्ष्मी एवं दूर्गा के प्रतीक मानते थे।
    इंदिरा की प्ररंभिक शिक्षा आनंद निवास पर ही हुई ।इन्होनें सिर्फ अंग्रैजी में दक्षता हासिल की और अन्य विषयों पर ध्यान कम दिया। फिर शांति निकेतन उसके बाद उच्च शिक्षा हेतु इंगलैंड गई वैडमिंटन स्कूल तथा आक्सपोर्ड  विश्वविद्याल  में अध्यन किया  फिर ये भारत आ गई । उन्हें विश्व भर के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया था। प्रभावशाली शैक्षिक पृष्ठभूमि के कारण उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा विशेष योग्यता प्रमाण दिया गया। श्रीमती इंदिरा गांधी शुरू से ही स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहीं। बचपन में उन्होंने बाल चरखा संघकी स्थापना की और असहयोग आंदोलन के दौरान कांग्रेस पार्टी की सहायता के लिए 1930 में बच्चों के सहयोग से  वानर सेनाका निर्माण किया।

    लंदन में अध्ययन के दौरान ही इनकी मुलाकात फिरोज गांधी से हुई थी। उन्होंने 26 मार्च 1942 को फ़िरोज़ गाँधी से विवाह किया। उनके दो पुत्र थे। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय सहभागिता के लिए सितम्बर 1942 में उन्हें जेल में डाल दिया गया। 1947 में इन्होंने गाँधी जी के मार्गदर्शन में दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में कार्य किया। 1955 में श्रीमती इंदिरा गाँधी कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनी।1958 में उन्हें कांग्रेस के केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।वे एआईसीसी के राष्ट्रीय एकता परिषद की उपाध्यक्ष और 1956 में अखिल भारतीय युवा कांग्रेस और एआईसीसी महिला विभाग की अध्यक्ष बनीं।वे वर्ष 1959 से 1960 तक  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं।  स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को उनके कामों में हाथ बटाने लगी। 1962 में चीन हमले के कारण नेहरु जी को शौक  लगा और इसी के करण चिंताग्रस्त रहने लगे औऱ अंततः  27 मई 964 को नेहरु जी का निधन हो गया। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने और उन्हीं की प्रेरणा से चुनाव लड़ी औऱ जीतने के बाद शास्त्री मंत्रीमंडल में सूचना एंव प्रसारण मंत्री बनी।इस समय रेडियों का जमाना था।इसने इसमें काफी परिवर्तन किया और इसे मनोरंजक बनाया तथा यही रेडियो भारतीयों में  युद्द के दौरान राष्ट्रीयता का बीज रोपने में सहायक सिद्द हुआ। वह 1964-1966 तक सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं ।   इंदिरा हरित क्रांति की अगुआ बनी औऱ देश को खाद्यान उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाई। पंचवर्षीय योजनाओं से गरीबी उन्मुलन पर बल दी।  हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मुद्दे पर दक्षिण और गैर हिंदी राज्यों में दंगा छिड़ने पर चेनेई गई औऱ स्थिति को शांत की। 1965 में भारत पाक युद्द के समय सेना द्वारा मना करने के वावयूद  इंदिरा सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र श्रीनगर गई। सोवियत संघ के मध्यस्थता के बाद ताशकंद में भारत-पाक समझौता हुआ जिसमें भारत की ओऱ से तत्कालिन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तथा पाकिस्तान की ओर से अयूब खान ने हस्ताक्षर किये। इस समझौते पर ह्स्ताक्षर के कुछ घंटे बाद ही शास्त्री जी का निधन हो गया।
    शास्त्री जी के निधन के बाद तत्कालिन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष  के.कामराज ने इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाया। इस  कदम से कांग्रेस में मोरार जी देसाई सहित कई नेता नराज हो गये। फिर इंदिरा ने सरकार के मुख्य पदों से कई को हटाकर अपने चहेतों को पदास्थापित किया। 1967 में चुनाव में मनमुताबिक सफलता नही मिली जिससें वो समाजवादी एवं सामयदलों के सहयोग से सरकार चलाई पर मोरार जी से मतभेद बढने के कारण 1969 में भारतीय कांग्रेस (आई) की स्थापना की। बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पहला कार्यकाल 1966 से 1971 तक रहा। भारत की अर्थब्यवस्था को पंख लगाने के लिए 1969 में 14 बैंको का राष्ट्रीयकरण किया। इसी बीच  भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 की जंग पूरी दुनिया ने देखी। 30 जनवरी,  1971 को आतंकवादी इंडियन एयरलाइंस के एक विमान को हाइजैक कर लाहौर ले गए और इसे तहस-नहस कर दिया था। उस वक्त इंदिरा गांधी ने भारत से होकर आने-जाने वाली पाकिस्तान की सभी फ्लाइट्स के उड़ान पर प्रतिवंध लगा दिया । इसका यह फायदा हुआ कि अक्टूबर-नवंबर में जब संकट चरम पर था तो पाकिस्तान अपनी सेनाएं पूर्वी बंगाल में पहुंचाने में नाकाम रहा। इंदिरा ने सेनाध्यक्ष से राय मशविरा की तो सेनाअध्यक्ष ने जंग में कुदने से मना कर दिया पर सेनाध्यक्ष को मनायी। अंततः सेनाअध्यक्ष मानेक शा मान गये पर कहा कि हमें आजादी चाहिये। इंदिरा ने हां कर दी औऱ परिणाम सारी दुनिया जानता है कि एक अलग राष्ट्र बंगला देश का उदय हुआ। 
        फिर आंतरिक सुरक्षा के मामने में सोवियत संघ से 20 साल की संधि कर देश को विकास के राह पर ले गई औऱ  1974 में  भारत चीन और पाकिस्तान से सामरिक सुरक्षा के मद्दे नजर पोखरन में परमाणु परीक्षण कर यह जता दिया कि भारत भी किसी से कम नहीं है। जनवरी 1978 में उन्होंने फिर से कांग्रेस का अध्यक्ष पद ग्रहण किया। इंदिरा कड़े मिजाज की थीं और उनके फैसले में आक्रामकता की झलक दिखती थी। 1980 में पुनः प्रधानमंत्री बनी और फिर से 6 नीजि बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। इंदिरा ने देशहित में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए औऱ इसी के करण इन्हें जन मानस मे लोग आयरन लेडी( लौह महिला) कहा जाने लगा। स्वर्ण मंदिर परिसर में सेना भेजकर आतंकवादियो का सफाया कर दिया जिससे सिख कौम नराज हो गया और अंत में इनके सिख कौंम के अंग रक्षक ही 31 अक्टूबर 1984 को गोली मार कर इनकी निर्मम हत्या कर दी। ऐसे महान महिला भारत में बहुत कम ही जन्म लेती है।
लेखक –बरिष्ठ साहित्यकार एंव पत्रकार हैं
फोन- 7042663073





सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

लोक आस्था का महापर्व- छठ व्रत

लोक आस्था का महापर्व- छठ व्रत  

              लाल बिहारी लाल  

छठ मईया की महिमा,जाने सकल जहान।
लाल पावे जे  पूजे, सदा करी कल्याण।।
                                        (लाल बिहारी लाल)
 


छठ व्रत षष्टी यानी की छठे दिन मनाया जाता है इसलिए इसका नाम छठ पर्व पड़ गया। छठ व्रत भगवान सूर्यदेव को समर्पित एक हिंदुऔं का विशेष पर्व है। उतर भारत के कई हिस्सों में खासकर यू.पी. और बिहार में तो इसे महापर्व के रुप में  मानाया जाता है। शुद्धता, स्वच्छता और पवित्रता के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व आदिकाल से मनाया जा रहा है। छठ व्रत में छठी माता की पूजा होती है और उनसे संतान व परिवार की रक्षा का वर मांगा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से छठ  मैया का व्रत करता है। उसे संतान सुख जरुर प्राप्त होता है।
   हर वर्ष चैत एवं कार्तिक महिने में मनाया जाता है। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में दीवाली के चौथे दिन से शुरु होकर सातवें दिन तक कुल 4 दिनों तक मानाया जाता है। इसमें पहले दिन यानी चतुर्थी को घऱबार साफ सुथरा करके स्नान करने के बाद खाना में चावल तथा चने दाल तथा लौकी का सादा सब्जी बनाया जाता है फिर खाया जाता है जिसे नहा खाये कहते है। अगले दिन संध्या में पंचमी के दिन खरना यानी के गुड़ में चावल का खीर बनाया जाता है। उपले और आम के लकड़ी से मिट्टी के चूल्हें पर फिर सादे रोटी और केला के साथ मां को याद करते हुए अग्रासन निकालने के बाद धूप हुमाद के साथ पूजा के बाद पहले व्रती खाती है फिर घर के अन्य सदस्य खाते हैं। इसी के साथ मां का आगमन हो जाता है। तत्पश्चात षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं। संध्या के समय पकवानों को बड़े बडे बांस के डालों तथा टोकरीयों में भरकर नदी, तालाब, सरोवर आदि के किनारे ले जाया जाता है।जिसे छठ घाट कहा जाता है। फिर व्रत करने वाले भक्त उन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्टी माता को आर्घ्य देते हैं।ताकि जाते हुए माता सभी दुख दर्द लेती जाये और फिर सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने-अपने घर आ जाते हैं। छठ व्रत के दौरान रात भर जागरण किया जाता है और सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केलामिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं। व्रत करने वाले सभी व्रतधारी सुबह के समय उगते सूर्य को आर्घ्य देते हैं ताकि जीवन में नई उर्जा के संचार हो। इसमें अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है।कथाके बाद छठ घाट पर प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने-अपने घर लौट आते हैं। तथा व्रत करने वाले इस दिन पारण करते हैं। यह क्रम खरना के दिन से व्रती लगातार 36 घंटे निर्जल एवं निराहार रहते हुए व्रत करती है।इसलिए इसे कठिनतम व्रत कहा गया है।
        कार्तिक मास में  षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले छठ व्रत की शुरुआत रामायण काल से हुई थी। लोक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को त्रेतायुग में माता सीता ने तथा द्वापर युग में पांडु की पत्नी कुन्ती ने की थी जिससे कर्ण के रुप में संतान पाई थी। पांडव की पत्नी द्रौपदी ने भी इस व्रत को किया था।हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं। वास्तव में इनकी रोशनी से ही प्रकृति में जीवन चक्र चलता है। इनकी किरणों से धरती में फलफूल, अनाज उत्पन्न होता है । सूर्य षष्टी या छठ व्रत भी इन्हीं भगवान सूर्य को समर्पित है । इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी होती है।छठ पूजन कथानुसार छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भक्तगण भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी अन्य नदी या जल स्त्रोत के किनारे इस पूजा को मनाते हैं। इस ब्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है तथा इस व्रत को करने वाले सभी प्राणियों  की मनोकामनाये पूर्ण होती है।
       यह  पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। और यह  भगवान सूर्य को समर्पित है। बिहार और पूर्वांचल के निवासी आज जहां भी हैं वे सूर्य भगवान को अर्ग देने की परंपरा को आज भी कायम रखे हुए हैं।यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है। इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम सूर्यवंशी थे और उनके कुल देवता सूर्यदेव थे। इसलिए भगवान राम जब लंका से रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए उन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया। सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे ।
    एक अन्य कथा के अनुसार एक राजा प्रियव्रत थे उनकी पत्नी थी मालिनी राजा रानी नि:संतान होने से बहुत दु:खी थे। उन्होंने महर्षि कश्यप से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रभाव से मालिनी गर्भवती हुई परंतु नौ महीने बाद जब उन्होंने बालक को जन्म दिया तो वह मृत पैदा हुआ। प्रियव्रत इस से अत्यंत दु:खी हुए और आत्म हत्या करने हेतु तत्पर हुए ।प्रियव्रत जैसे ही आत्महत्या करने वाले थे उसी समय एक देवी वहां प्रकट हुईं। देवी ने कहा प्रियव्रत मैं षष्टी देवी हूं। मेरी पूजा आराधना से पुत्र की प्राप्ति होती है, मैं सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ण करने वाली हूं। अत: तुम मेरी पूजा करो तुम्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। राजा ने देवी की आज्ञा मान कर कार्तिक शुक्ल 
षष्टी तिथि को देवी षष्टी की पूजा की जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई । और उसी दिन से छठ व्रत का अनुष्ठान चला आ रहा है।
     इस त्यौहार को बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश एवं भारत के पड़ोसी देश नेपाल में हर्षोल्लास एवं नियम निष्ठा के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार की यहां बड़ी मान्यता है। इस महापर्व में देवी षष्ठी माता एवं भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के 
लिए स्त्री और पुरूष दोनों ही व्रत रखते हैं। व्रत चार दिनों का होता है पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि हेतु व्रत करने वाले केवल अरवा खाते हैं । तत्पश्चात 
षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं। संध्या के समय पकवानों को बड़े बडे बांस के डालों तथा टोकरीयों में भरकर नदी, तालाब, सरोवर आदि के किनारे ले जाया जाता है। फिर व्रत करने वाले भक्त उन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्टी माता को आर्घ्य देते हैं। और फिर सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने-अपने घर आ जाते हैं। छठ व्रत के दौरान रात भर जागरण किया जाता है और सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केलामिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं। व्रत करने वाले सभी व्रतधारी सुबह के समय उगते सूर्य को आर्घ्य देते हैं। अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी 
व्रत की कथा कही और सुनी जाती है। कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने-अपने घर लौट आते हैं। तथा व्रत करने वाले इस दिन पारण करते हैं।
    इस पर्व के विषय में मान्यता है कि षष्टी माता और सूर्य देव से इस दिन जो भी मांगा जाता है वह मनोकामना पूरी होती है । इस अवसर पर मनोकामना पूरी होने पर बहुत से लोग सूर्य देव को दंडवत प्रणाम करते हैं। सूर्य को दंडवत प्रणाम करने का व्रत बहुत ही कठिन होता है, लोग अपने घर में कुल देवी या देवता को प्रणाम कर नदी तट तक दंड देते हुए जाते हैं। दंड प्रक्रिया के अनुसार पहले सीधे खडे होकर सूर्य देव को प्रणाम किया जाता है फिर पेट की ओर से ज़मीन पर लेटकर दाहिने हाथ से ज़मीन पर एक रेखा खींची जाती है. यही प्रक्रिया नदी तट तक पहुंचने तक बार बार दुहरायी जाती है । भगवान सूर्यदेव के प्रति भक्तों के अटल आस्था का अनूठा पर्व छठ हिन्दू पंचांग के  अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है। इस साल छठ पर्व 24 अक्टूबर से 27 अक्टूबर, 2017 तक मनाया जाएगा। 
    मार्कण्डेय पुराण में छठ पर्व के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।दिवाली के ठीक छह दिन बाद मनाए जानेवाले इस महाव्रत की सबसे कठिन और साधकों हेतु सबसे महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्टी की होती है, जिस कारण हिन्दुओं के इस परम पवित्र व्रत का नाम छठ (Chhath Puja) पड़ा। चार दिनों तक मनाया जानेवाला सूर्योपासना का यह अनुपम महापर्व मुख्य रूप से बिहारझारखंड, उत्तरप्रदेश सहित सम्पूर्ण भारतवर्ष में बहुत ही धूमधाम और हर्सोल्लास से मनाया जाता है ।

लाल बिहारी लाल
फोन-7042663073
(वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)